सुरक्षित राजधानी में असुरक्षित महिलाएं
भारत की राजधानी दिल्ली को भले ही नंबर एक शहर घोषित किया राया हो, पर यह अभी भी महिलाओं के लिए असुरक्षित है। यहाँ प्रतिदिन उनके साथ कुछ ऐसा घट जाता है कि उनकी सुरक्षा को लेकर एक विषम स्थिति उत्पन्न ढो जाती है। कभी वे बलात्कार का शिकार बनती हैं तो कभी हिसा का। दिल्ली बिश्वत्रिदूथालय की छात्राओं ने छेड़छाड़ के विरन्दूध व्यापक प्रदर्शन किया था। यह स्थिति चिंताजनक है।
कुछेक महिला कार्यकर्ताओं का मानना है कि दिल्ली के नागरिकों ने महिला के सम्मान की संस्कृति को विकसित ही नहीं किया। सार्वजनिक स्थलों पर मी यौनिक हमले की शिकार औरत की मदद के लिए कोई आगे नहीं आता। पुलिस अधिकारी कमी दिल्ली में बढती आबस्वी, सडकों पर कम रोशनी क्रो उसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं तो कमी कोई और वज़ह गिनाते हैं। अध्ययन . सर्वक्षण, आँकडे बताते है' कि इस महानगरी में महिलाएँ सुरक्षित नहीं हैं। यहाँ हर लड़कौ/औस्त को कई निगाहें पीछा कश्ती हैं। नेशनल इंस्टीटूयूट आँफ क्रिमिवोलॉजी और फरिसिक्र साइना न्बारा हाल में किए गए अध्ययन 'दिल्ली में महिलाएँ कितनी सुरक्षित अथवा असुरक्षित हैं' के अनुसार इस शरुर की 80 फीसदी महिलाएँ खुद क्रो बाजार व माँल में असुरक्षित महसूस करतो हैं। 70 फीसदी अंधेरे में, 30 फीसदी हमेशा हर जगह खुद को असुरक्षित पाती हैं। 50 फीसदी महिलाएँ सार्वजनिक बस को महिलाओँ के लिए सुरक्षित नहीं मानतीं। स्लम य गाँवों में रहने चाली महिलाओं की तुलना में संभांत व नवविकसित इलाकों की महिला निवासी खुद को ज्यादा असुरक्षित महसूस करती हैं। इस अध्ययन में महिलाओं का पुलिस पर कम भरोसे की दो वजह बताई गई हैं। एक, पुलिस मेट्रोलिग का नज़र नही' आना य दूसरा, महिला शिकायतकर्ता के साथ पुलिस का व्यवहारा |
दिल्ली में महिलाएँ खुद को कहॉ , किस हालत मैं असुरक्षित महसूस करती हैं यह जानने के लिए दिल्ली के 'जागोरी' नामक महिला संगठन ने (अगस्त 20०5 -जुलाई 2006) दिल्ली के बिभिन्न बाईस इलाकों का 'सैपटौ अगेडैट' किया। इन बाईस इलाकों में दिल्ली विश्वबिटूयालय, वसंत कुंज, साउथ एक्सटेंशन माग… 1 . नेहरू प्लेस, साकेत, सरिता बिहार, परिचय पुरी, मयूर बिहार, कल्याण पुरी, मदनपुर खादर, बचाना, इडिमा गेट शामिल हैं। दिल्ली मैं पहली बार किए गए सेफ्टी आँडिट से पता चला कि यहाँ कई जगहों यर गलियों/सडकों की वस्ती की रोशनी या तो गुल हैं या बहुत कम रोशनी है। ऐसे मैं महिलाएँ खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं। दिल्ली विश्वविदूयालय को छात्राएँ अंधेरा होने के बाद इच्छा ’के विरन्दूध कैंपस की सडकों पर नहीं निकलती हैं, क्योकि अधिकांश सडकों पर बहुत कम रोशनी ढोती है और दुपहिया व कार मे' बैठे पुरुष उन्हें त'ग करते हैं। पुस्तकालय देर तक खुले हाँ तो भी दिल्ली बिश्वविदूयालय की छात्राएँ देर रात तक पुस्तकालय में अध्ययन के लिए बहुत कम जाती हैं। लडकियाँ भी दिल्ली विरवबिदूयालय को उतनी ही फीस देती हैं, जितनी लडके, लेकिन ये चाहकर भी विश्चवितूयालय पुस्तकालय मैं उतना अध्ययन नहीं कर पातीं। सवाल देर रात पुस्तकालय से लौट रही छात्रा का ही या देर रात होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम से लौट रही स्वी का हौ या रात की पाली से घर लोट रही महिला का हो, उरी सुरक्षित माहौल मुहैया कराना राज्यापुलिस की जिम्मेदारी है। लेकिन दिल्ली पुलिस अपनी इस जवाबदेही से बचती है। यह जाहिर होता है दिल्ली पुलिस के महिला सुरक्षा विज्ञापनों से। ऐसे विज्ञापनों मैं दिल्ली पुलिस महिलाओँ क्रो सुनसान रास्ते पर न जाने, देर रात को अकेले घर के बाहर न निकलने को सलाह देती हैं। क्या ऐसै परामर्श औरत कै शैक्षणिक, सामाजिक . आर्थिक गतिविधियों पर अंकुश नहीं लगाते 2 देर शाम को होने वाली सांस्कृतिक गतिविधियों से दूर नहीं रखते ? क्या औरत के व्यक्तित्व के सर्वागीण विकास के रास्तो' को सील नहीं करते 2 कुछ महीने पहले बिल्लो पुलिस ने दिल्ली में रह रही उत्नर-मूर्वोत्सर राज्यों की लडकियों को सुरक्षा संबंधी हिदायतें देने के लिए एक पुस्तिका तैयार की।
'दिल्ली में महिलाएँ कितनी सुरक्षित अथवा असुरक्षित हैं' विषय पर यह अध्ययन ब्यूरो आँफ पुलिस रिसर्च एड डेवलपमेंट के सहयोग से किया गया है। इस अध्ययन में लडकियों को आत्मरक्षा के लिए मिर्च 'पाउडर या स्वे सस्ते दामों पर उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया है। दिल्ली पुलिस की महिला अपराध शाखा ने बीते पाँच वर्षों मैं चालीस हजार . से ज्यादा लडकियों/महिलाओँ को आत्मरक्षा में प्रशिक्षित किया है। मुख्य सवाल यह है कि दिल्ली सुरक्षा की दृष्टि से 'महिला मैत्री शहर बने। इसके लिए पुलिस अपने भीतर बदलाव और अपनी कमियों को दूर करने के लिए कब ईमानदारी से पहल करेगी ? इस आजाद महानगर में औरतों के प्रति पुलिस की असंवेदनशीलता के स्राथ-साथ पुरुष समाज का आधी आबादी के लिए वक्त की रफ्तार के साथ न बदलना भी तकलीफ पहुचाता है।

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